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मोदी सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने पर गुरुद्वारा आलमबाग में आयोजित हुई विशेष अरदास

    लखनऊ। केंद्र सरकार के 12 वर्ष सफलतापूर्वक पूर्ण होने के उपलक्ष्य में गुरुद्वारा आलमबाग, लखनऊ में विशेष अरदास का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम राज्यसभा सांसद एवं चंडीगढ़ विश्वविद्यालय के कुलाधिपति सरदार सतनाम सिंह संधू की ओर से आयोजित किया गया। कार्यक्रम में देश की उन्नति, समृद्धि और जनकल्याण के लिए अरदास की गई। बड़ी संख्या में संगत उपस्थित रही और सभी ने राष्ट्र के विकास व सामाजिक सद्भाव के लिए गुरु घर में मत्था टेककर आशीर्वाद प्राप्त किया। सांसद सरदार सतनाम सिंह संधू ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते 12 वर्षों में देश ने विकास, सुशासन, आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनकल्याण के क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं।  कार्यक्रम में लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल, राजू गांधी और गिरीश मिश्रा विशेष रूप से उपस्थित रहे।  गुरुद्वारा आलमबाग की ओर से मनमोहन सिंह, भूपिंदर सिंह पिंदा, राजेंद्र सिंह राजू कार्यवाहक प्रधान, परविंदर सिंह, इकबाल सिंह, परमजीत सिंह बॉबी, इंदरपाल सिंह, त्रिलोक सिंह बहल और त्रिलोक सिंह टुटेजा ने भी कार्यक्रम में सहभाग...

गोडसे की अस्थियां क्यों सुरक्षित रखी हुई हैं आजतक ?


आज 30 जनवरी है। 72 साल पहले यानी 1948 में आज ही के दिन भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी की हत्या हुई थी और हत्यारे का नाम था नाथूराम गोडसे। उसने अपनी पिस्टल से एक के बाद एक तीन गोलियां गांधीजी के शरीर में उतार दी थीं। इस घटना के बाद पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई थी। सभी के चेहरे पर मायूसी थी। हालांकि उस वक्त तक तक बहुत से लोगों को ये नहीं पता था कि गांधीजी की मौत हो चुकी है। बाद में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने लोगों को बताया था कि गांधीजी अब इस दुनिया में नहीं हैं। 


उधर, गांधीजी की हत्या के जुर्म में नाथूराम गोडसे को गिरफ्तार कर लिया गया। उसपर एक साल से भी अधिक समय तक मुकदमा चला। इस दौरान उसने अदालत में अपना जुर्म भी कबूल किया और कहा कि उसी ने गांधीजी को मारा है। अपना पक्ष रखते हुए गोडसे ने अदालत में कहा था, 'गांधीजी ने जो देश की सेवा की है, उसका मैं आदर करता हूं और इसीलिए उनपर गोली चलाने से पहले मैं उनके सम्मान में झुका भी था, लेकिन चूंकि उन्होंने अखंड भारत के दो टुकड़े कराए, इसीलिए मैंने उन्हें गोली मारी।'  


आखिरकार आठ नवंबर, 1949 को अदालत ने गोडसे को मृत्युदंड की सजा सुनाई। इसके बाद 15 नवंबर, 1949 को उसे अंबाला जेल में फांसी दे दी गई। फांसी से पहले गोडसे के एक हाथ में गीता और अखंड भारत का नक्शा था और दूसरे हाथ में भगवा झंडा था। कहा जाता है कि फांसी का फंदा पहनाए जाने से पहले गोडसे ने 'नमस्ते सदा वत्सले' का उच्चारण किया था और साथ ही नारे भी लगाए थे। 


शायद आप न जानते हों, लेकिन नाथूराम गोडसे की अस्थियां आज तक नदी में प्रवाहित नहीं की गई हैं। वो पुणे के शिवाजी नगर इलाके में स्थित एक इमारत के कमरे में सुरक्षित रखी हुई हैं। उस कमरे में गोडसे के अस्थि कलश के अलावा उसके कुछ कपड़े और हाथ से लिखे नोट्स भी संभालकर रखे गए हैं। 


नाथूराम गोडसे की भतीजी हिमानी सावरकर ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि फांसी के बाद गोडसे का शव भी उन्हें नहीं दिया गया था बल्कि सरकार ने खुद घग्घर नदी के किनारे उनका अंतिम संस्कार कर दिया था। इसके बाद उनकी अस्थियां हमें एक डिब्बे में भरकर दे दी गई थीं। आपको बता दें कि गोडसे की एक अंतिम इच्छा थी और इसीलिए उनके परिवार ने आज तक उनकी अस्थियों को नदी में नहीं बहाया है बल्कि उसे एक चांदी के कलश में सुरक्षित रखा गया है। 


हिमानी सावरकर के मुताबिक, नाथूराम गोडसे ने अपनी अंतिम इच्छा के तौर पर अपने परिवार वालों से कहा था कि उनकी अस्थियों को तब तक संभाल कर रखा जाए और जब तक कि सिंधु नदी स्वतंत्र भारत में समाहित न हो जाए और फिर से अखंड भारत का निर्माण न हो जाए। ये सपना पूरा हो जाने के बाद मेरी अस्थियों को सिंधु नदी में प्रवाहित कर दी जाए। यही वजह है कि गोडसे के परिवार ने आज तक उनकी अस्थियों को संभाल कर रखा है और उनके सपने के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं।  


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