राजधानी लखनऊ के जानकीपुरम क्षेत्र में आज *डॉक्टर आस्था, MBBS, MS - ENT * के *ट्राईसेंस क्लिनिक* का भव्य शुभारंभ किया गया। क्लिनिक का उद्घाटन फीता काटकर किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में क्षेत्रीय गणमान्य लोग, डॉक्टर और स्थानीय निवासी उपस्थित रहे। क्लिनिक में उपलब्ध सुविधाएं डॉक्टर आस्था ने बताया कि ट्राईसेंस क्लिनिक में कान, नाक और गले से जुड़ी सभी बीमारियों की जांच और उपचार अत्याधुनिक उपकरणों के साथ किया जाएगा। क्लिनिक का उद्देश्य क्षेत्र के लोगों को सस्ती, गुणवत्तापूर्ण और समय पर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। जेनेक्स पैथोलॉजी लैब दे रही 4 साल से सेवा इस अवसर पर *डॉक्टर आदर्श* द्वारा संचालित *जेनेक्स पैथोलॉजी लैब* का भी उल्लेख किया गया। जेनेक्स पैथोलॉजी लैब पिछले 4 वर्षों से जानकीपुरम क्षेत्र में लोगों को विश्वसनीय पैथोलॉजी जांच सेवाएं प्रदान कर रही है। बहुत जल्द लैब में एक-रे सीटी स्कैन जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध होगी।क्लिनिक और लैब के समन्वय से मरीजों को एक ही स्थान पर जांच और उपचार की सुविधा मिल सकेगी। डॉक्टर आस्था ने कहा कि "हमारा प्रयास है कि जानकीपुरम और आसपास के क्षेत...
लखनऊ। कैंसर के मरीजों पर सभी दवाएं असर नहीं करती हैं। उल्टा कुछ दवाएं नुकसान भी पहुंचा सकती हैं। केजीएमयू में अब बिना चीर-फाड़ किए ही यह पता लगाया जा सकेगा कि किस मरीज पर कौन सी दवा असर करने वाली है। डायनेमिक कंट्रास्ट इनहैंस्ड मैग्नेटिक रेजोनेंस (डीसीई-एमआरआई) की मदद से यह हो सकेगा। केजीएमयू के रेडियो डायग्नोसिस विभाग में तीन साल तक हुए शोध में यह निष्कर्ष निकला है। इस शोध को अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित क्लीनिकल कैंसर रिसर्च जर्नल में मान्यता दी गई है।
केजीएमयू के रेडियो डायग्नोसिस विभाग के शिक्षक डॉ. दुर्गेश द्विवेदी ने वर्ष 2016 से 2019 के बीच यह शोध किया है। अब इसे जर्नल ने मान्यता देते हुए छापने का फैसला किया है। डॉ. दुर्गेश ने बताया कि किडनी के कैंसर से पीड़ित मरीजों के लिए फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने 13 दवाओं को मान्यता दी है। इन दवाओं को तीन समूह में बांटा गया है। इसके बावजूद अभी भी यह बता पाना मुश्किल है कि किस मरीज पर कौन सी दसा असर करेगी। कई बार मरीज को दी जा रही दवा फायदा करने के बजाय नुकसान कर देती है। यह स्थिति कैंसर के मरीज के लिए और भी घातक होती है। किडनी मेें मौजूद ट्यूमर की जांच ऑपरेशन कर उसे बाहर निकालने के बाद ही संभव हो पाती थी। ऐसे में दवाओं से उनका इलाज करना काफी चुनौती भरा काम होता है। इसको देखते हुए विभाग में डीसीई-एमआरआई का उपयोग कर रेडियोजिनोमिक्स विधा विकसित की। यह इमेजिंग, रेडियोमिक्स तथा जिनोमिक्स का मिश्रण है।
चिकित्सा प्रणाली का हो सकेगा चयन
डॉ. दुर्गेश ने बताया कि इस शोध के लिए 49 मरीजों के 80 नमूने लिए गए। ये मरीज एंजीयोजेनिक तथा इम्यूनोथेरेपी ले रहे थे। डीसीई-एमआरआई विश्लेषण से पता चला कि एक ही ट्यूमर में एंजियोजेनेसिस और एंफ्लामेटरी विभिन्न तरीकों से बढ़ रहे थे। कैंसर में कोशिकाएं अपनी खुद की ब्लड सप्लाई विकसित कर लेती हैं। इस शोध के बाद ऐसी कोशिकाओं की पहचान की जा सकेगी तथा बेहतर दवा दी जा सकेगी। इस प्रणाली का उपयोग अब केजीएमयू में भी हो सकेगा। विवि के कुलपति ले. जनरल डॉ. बिपिन पुरी ने रेडियोडायग्नोसिस विभाग को बधाई देते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. नीरा कोहली तथा अन्य संकाय सदस्यों को सुझाव दिया कि इस अध्ययन को रोगियों के हित में लाभकारी बनाया जाए। इसके बाद अब इसे लागू करने की तैयारी हो रही है।
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